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गुरुवार, 4 जनवरी 2018

पुरुष सूक्त



पुरुषसूक्त (ऋग्वेद)

सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्।
स भूमिं सर्वतः स्पृत्वाऽत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्॥1॥

(जो सहस्रों सिरवाले, सहस्रों नेत्रवाले और सहस्रों चरणवाले विराट पुरुष हैं, वे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को आच्छादित करके भी दस अंगुल शेष रहते हैं।)

पुरुषऽएवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भाव्यम्।
उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति॥2॥

(जो हो चुका है और जो होने वाला है—यह सब वही विराट पुरुष हैं। अमरत्व के भी वही स्वामी हैं।)

एतावानस्य महिमातो ज्यायांश्च पुरुषः।
पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि॥3॥

(विराट पुरुष की महिमा असीम है। एक चरण में समस्त प्राणी हैं और तीन भाग दिव्य लोक में स्थित हैं।)

त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत्पुनः।
ततो विष्वङ् व्यक्रामत्साशनानशनाभि॥4॥

(उस विराट पुरुष के तीन भाग ऊपर हैं और एक भाग इस जगत में।)

ततो विराडजायत विराजोऽधि पुरुषः।
स जातोऽत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः॥5॥

(उस विराट पुरुष से यह ब्रह्माण्ड उत्पन्न हुआ और समस्त देहधारी जीव प्रकट हुए।)

तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः सम्भृतं पृषदाज्यम्।
पशूँस्तांश्चक्रे वायव्यानारण्या ग्राम्याश्च ये॥6॥

(विराट यज्ञ से पशु, गौ, अश्व आदि उत्पन्न हुए।)

तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे।
छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत॥7॥

(इसी विराट से ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद एवं अथर्ववेद उत्पन्न हुए।)

तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः।
गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता अजावयः॥8॥

(घोड़े, गौ, बकरियाँ एवं भेड़ें उसी विराट से उत्पन्न हुईं।)

तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन् पुरुषं जातमग्रतः।
तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये॥9॥

(देवताओं और ऋषियों ने उसी विराट पुरुष का यज्ञ द्वारा पूजन किया।)

यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन्।
मुखं किमस्यासीत् किं बाहू किं ऊरू पादाऽउच्येते॥10॥

(उस विराट पुरुष के मुख, भुजाएँ, जंघाएँ और पाँव क्या हैं—यह प्रश्न किया गया।)

ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः।
ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रोऽजायत॥11॥

(उसका मुख ब्राह्मण, भुजाएँ क्षत्रिय, जंघाएँ वैश्य और चरण शूद्र हुए।)

चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत।
श्रोत्राद्वायुश्च प्राणश्च मुखादग्निरजायत॥12॥

(उसके मन से चन्द्रमा, नेत्रों से सूर्य, कानों से वायु और मुख से अग्नि उत्पन्न हुई।)

यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत।
वसन्तोऽस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः॥14॥

(ऋतुएँ भी उस विराट यज्ञ का भाग बनीं।)

यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्।
ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः॥16॥

(यज्ञ द्वारा यज्ञ की आराधना हुई और वही सनातन धर्म की उत्पत्ति है।)

शान्तिः ॥ शान्तिः ॥ शान्तिः ॥


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