यह कैसा मृत्युभोज है ???
जिस भोजन को रोते हुए बनाया जाता है,
जिस भोजन के लिए रोते हुए बुलाया जाता है,
जिस भोजन को आँसू बहाते हुए खाया जाता है—
उसी भोजन को मृत्युभोज कहा जाता है।
जिस परिवार में विपदा आई हो, उस संकट की घड़ी में उनके साथ खड़े होना,
तन–मन–धन से सहयोग करना हमारा कर्तव्य है,
न कि उनके दुख को भोज में बदल देना।
भोजन वही श्रेष्ठ होता है—
जब खिलाने वाले का मन भी प्रसन्न हो
और खाने वाले का मन भी प्रसन्न हो।
लेकिन जहाँ दोनों के हृदय में
दर्द, शोक और वेदना हो—
ऐसी स्थिति में भोजन करना कदापि उचित नहीं।
सच यह है कि—
तेरहवीं का भोज किसी भी शास्त्र-सम्मत संस्कार का भाग नहीं है।
किसी भी धर्मग्रंथ में मृत्युभोज का विधान नहीं मिलता।
मृत्युभोज खाने से
व्यक्ति की ऊर्जा नष्ट होती है,
यह भोजन ऊर्जावान नहीं, बल्कि नकारात्मक प्रभाव वाला होता है।
इसी कारण अनेक महापुरुषों ने
मृत्युभोज का जोरदार विरोध किया है।
सोचिए—
लकड़ी फाड़ी जाती है तो रोते हुए,
आटा गूँथा जाता है तो रोते हुए,
पूड़ी बनाई जाती है तो रोते हुए,
खिलाने वाला भी रोता है,
और खाने वाला भी रोता है।
तो क्या आँसुओं से भीगा भोजन
किसी भी दृष्टि से ग्रहण योग्य हो सकता है?
जानवरों से भी सीखें
जिसका साथी बिछुड़ जाता है,
वह उस दिन चारा तक नहीं खाता।
और तथाकथित बुद्धिमान मानव
मृत्यु के नाम पर हलुवा–पूड़ी खाकर शोक का ढोंग करता है।
इससे अधिक निंदनीय कृत्य
और कोई हो ही नहीं सकता।
आज संकल्प लें
यदि आप इस विचार से सहमत हैं,
तो आज से यह संकल्प लें—
👉 मैं किसी के भी मृत्युभोज को ग्रहण नहीं करूँगा।
मृत्युभोज समाज में फैली एक कुरीति है,
जो समाज के लिए अभिशाप बन चुकी है।
👉 इसका जोरदार बहिष्कार करें
और समाज को सही दिशा दें।
आध्यात्मिक मार्गदर्शन एवं सामाजिक शुद्धि के लिए संपर्क करें
Dr. Bhargu Astrologer
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