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शनिवार, 20 जनवरी 2018

नारी, अधिकार और कर्तव्य



नारी, अधिकार और कर्तव्य

कहते हैं कि कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है।
हमारे भारत के संविधान ने नारी जाति को समानता का दर्जा दिया है, परंतु जब तक हमारी माएँ और बहनें शिक्षित एवं जागरूक नहीं बनेंगी, तब तक केवल अधिकार मिलने से कुछ भी प्राप्त नहीं होगा।

अपने मूल अधिकारों को पाने के लिए कर्तव्यों का निर्वहन आवश्यक है।
कर्तव्य निभाने से हमें कोई नहीं रोक सकता, बशर्ते हमारे भीतर कर्म करने की निष्ठा और लगन हो।

अपनी मंज़िल तक पहुँचने के लिए सफ़र हमें स्वयं तय करना पड़ता है।
पेड़ फल तो अवश्य देता है, पर उस फल का स्वाद पाने के लिए उसे प्राप्त करने की कोई न कोई युक्ति अपनानी ही पड़ती है। तभी उसका खट्टा-मीठा स्वाद चखा जा सकता है।

कर्म से कोई बच नहीं सकता — कर्म तो हमें अवश्य करना होगा।

हमें इस धरा पर गंगा की धारा की तरह पवित्र, कोमल, तीव्र और निरंतर बहना होगा।
मैं यह अवश्य मानता हूँ कि इस तपती हुई धरती पर गिरने वाली वर्षा की पहली बूंद को स्वयं फना होना पड़ता है, परंतु कोई भी कुर्बानी कभी निष्फल नहीं होती।

नारी के लिए कोई भी कार्य असंभव नहीं है।
जैसा कि किसी ने ठीक ही कहा है —
मौसम को बनाने के लिए, वर्षा को लगातार बरसना पड़ता है।


आध्यात्मिक मार्गदर्शन एवं परामर्श हेतु

Dr. Bhargu Astrologer
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