परमात्मा की खोज को पराए की खोज मत समझ लेना।
‘परमात्मा’ शब्द में जो ‘पर’ लगा है, उससे भ्रांति में मत पड़ जाना।
परमात्मा की खोज पर की खोज नहीं, बल्कि स्व की खोज है।
परमात्मा की खोज आत्मा की खोज है। यह खोज बाहरी नहीं, आंतरिक है।
यहाँ आँखें बाहर नहीं, भीतर लौटानी होती हैं।
यहाँ सारी यात्रा अंतर्मुखी होती है।
आँख खोलकर बहुत खोज लिया,
अब आँख बंद करके खोजना है।
बाहर का बहुत संगीत सुना—
जो कभी मन को बहलाता रहा, कभी लुभाता रहा, कभी मनोरंजन करता रहा।
अब मनोभंजन करना है।
अब भीतर का संगीत सुनना है,
अब अनहद नाद सुनना है।
पूरा का पूरा परमात्मा तुम्हारे भीतर बैठा है—पूरा का पूरा।
जो जानते हैं, वे यह नहीं कहते कि तुम परमात्मा का अंश हो।
जो जानते हैं, वे कहते हैं—तुम पूरे परमात्मा हो।
उसके कहीं अंश या खंड नहीं होते।
पूर्णिमा की रात चंद्रमा निकलता है।
हज़ारों झीलों, तालाबों, नदियों, सागरों और पोखरों में उसका प्रतिबिंब बनता है।
लेकिन हर जगह पूरा चंद्रमा ही प्रतिबिंबित होता है।
ऐसा नहीं होता कि एक जगह चंद्रमा दिख गया तो दूसरी जगह नहीं दिखेगा,
या कहीं उसका टुकड़ा दिखे और कहीं टुकड़ा।
हर प्रतिबिंब पूरे चंद्रमा का होता है।
ठीक वैसे ही—
तुम पूरे परमात्मा हो,
क्योंकि तुम पूरे परमात्मा के प्रतिबिंब हो।
परमात्मा एक है,
उसके प्रतिबिंब अनंत हैं।
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