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मंगलवार, 2 जनवरी 2018

पुत्रदा एकादशी



पुत्रदा एकादशी व्रत का माहात्म्य

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दोष निवारण, संतान सुख, पूजा-विधि, व्रत, मंत्र और

युधिष्ठिर बोले —
हे श्रीकृष्ण! कृपा करके पौष मास के शुक्लपक्ष की एकादशी का माहात्म्य बताइए। उसका नाम क्या है, विधि क्या है और किस देवता का पूजन किया जाता है?

भगवान श्रीकृष्ण बोले —
राजन्! पौष मास के शुक्लपक्ष की एकादशी का नाम “पुत्रदा एकादशी” है।

पूजन विधि

पुत्रदा एकादशी के दिन नाम-मंत्रों के उच्चारण के साथ श्रीहरि विष्णु का पूजन करना चाहिए।
पूजन में विशेष रूप से निम्न फल अर्पित करें—
नारियल, सुपारी, बिजौरा नींबू, जमीरा नींबू, अनार, सुंदर आँवला, लौंग, बेर तथा विशेष रूप से आम
धूप-दीप से भगवान की विधिपूर्वक अर्चना करें।

इस एकादशी में दीपदान का विशेष महत्व है।
रात्रि में वैष्णव भक्तों के साथ जागरण करना चाहिए। जागरण का फल ऐसा है जो हजारों वर्षों की तपस्या से भी प्राप्त नहीं होता
यह एकादशी समस्त पापों का नाश करने वाली और अत्यंत पुण्यदायिनी है।

सम्पूर्ण त्रिलोकी में इससे श्रेष्ठ कोई तिथि नहीं है।
इस तिथि के अधिदेवता भगवान नारायण हैं, जो समस्त कामनाओं और सिद्धियों को पूर्ण करते हैं।


राजा सुकेतुमान की कथा

पूर्वकाल में भद्रावतीपुरी में राजा सुकेतुमान राज्य करते थे। उनकी रानी का नाम चम्पा था। राजा को कोई पुत्र न होने के कारण दोनों अत्यंत दुःखी रहते थे। पितर भी तर्पण न मिलने से व्याकुल थे।

एक दिन राजा घोड़े पर सवार होकर घने वन में चले गए। भ्रमण करते-करते उन्हें एक पुण्य सरोवर मिला, जहाँ अनेक मुनि वेदपाठ कर रहे थे। राजा ने उन्हें प्रणाम किया।

मुनियों ने कहा—
“राजन्! हम विश्वेदेव हैं। आज पुत्रदा एकादशी है, जो व्रत करने वाले को पुत्र प्रदान करती है।”

राजा ने विनती की—
“यदि आप प्रसन्न हों तो मुझे पुत्र प्रदान करें।”

मुनियों ने कहा—
“राजन्! आज विधिपूर्वक पुत्रदा एकादशी का व्रत करो। भगवान केशव की कृपा से तुम्हें अवश्य पुत्र की प्राप्ति होगी।”

राजा ने विधिपूर्वक व्रत किया, द्वादशी को पारण किया और मुनियों को प्रणाम कर घर लौट आए। शीघ्र ही रानी ने गर्भ धारण किया और समय आने पर तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया, जो आगे चलकर प्रजा का उत्तम पालनकर्ता बना।


व्रत का फल

जो मनुष्य श्रद्धा और एकाग्रता से पुत्रदा एकादशी का व्रत करता है—

  • उसे इस लोक में पुत्र की प्राप्ति होती है
  • मृत्यु के पश्चात् वह स्वर्ग को प्राप्त करता है
  • इस माहात्म्य को पढ़ने और सुनने से अग्निष्टोम यज्ञ का फल प्राप्त होता है

~ हिन्दू पंचांग ~ 


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