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सोमवार, 15 जनवरी 2018

भक्त के अधीन भगवान



एक कसाई था सदना। वह बहुत ईमानदार था। वह भगवान के नाम-कीर्तन में मस्त रहता था। यहाँ तक कि मांस काटते-बेचते हुए भी वह भगवद् नाम गुनगुनाता रहता था।

एक दिन वह अपनी ही धुन में कहीं जा रहा था कि उसके पैर से कोई पत्थर टकराया। वह रुक गया। उसने देखा कि एक काले रंग का गोल पत्थर है। उसने वह पत्थर उठा लिया और जेब में रख लिया, यह सोचकर कि यह मांस तौलने के काम आएगा।

वापस आकर उसने वह पत्थर मांस तौलने में इस्तेमाल किया। कुछ ही दिनों में उसे समझ आ गया कि यह पत्थर कोई साधारण नहीं है। जितना वजन तौलना होता, पत्थर उतना ही भारी हो जाता।

धीरे-धीरे यह बात फैल गई कि सदना कसाई के पास ऐसा पत्थर है जो मनचाहा वजन तौल देता है। किसी को एक किलो मांस देना हो तो पत्थर एक किलो का हो जाता, दो किलो चाहिए तो दो किलो का।

इस चमत्कार के कारण उसकी दुकान पर भीड़ लगने लगी और बिक्री बढ़ गई।

यह बात एक शुद्ध ब्राह्मण तक भी पहुँची। वह मांस की दुकान पर जाना नहीं चाहता था, पर चमत्कारी पत्थर देखने की उत्सुकता उसे वहाँ खींच लाई।

दूर से खड़े होकर उसने देखा कि पत्थर हर वजन को बराबर तौल रहा है। ध्यान से देखने पर उसके रोंगटे खड़े हो गए।

भीड़ छँटने के बाद ब्राह्मण सदना के पास गया। सदना ने आदरपूर्वक उसे बैठाया और सेवा पूछी।

ब्राह्मण बोला —
“मैं तुम्हारे इस चमत्कारिक पत्थर को देखने आया हूँ।”

फिर ब्राह्मण ने बताया कि जिसे पत्थर समझकर तुम मांस तौल रहे हो, वह वास्तव में श्रीशालिग्राम जी हैं — भगवान का स्वरूप। गले-कटे मांस के बीच उनका उपयोग करना बहुत बड़ा पाप है।

यह सुनकर सदना व्यथित हो गया।
अनुनय-विनय करके उसने शालिग्राम जी ब्राह्मण को सौंप दिए और कहा — आप ब्राह्मण हैं, आप ही इनकी सेवा करें।

ब्राह्मण शालिग्राम जी को आदरपूर्वक घर ले गया, स्नान कराया, पंचामृत से अभिषेक किया और पूजा करने लगा।

कुछ दिनों बाद ब्राह्मण को स्वप्न में श्रीशालिग्राम जी ने कहा —
“मैं तुम्हारी पूजा से प्रसन्न हूँ, पर मुझे फिर उसी कसाई के पास छोड़ आओ।”

कारण पूछने पर उत्तर मिला —
“तुम मेरी पूजा करते हो, पर सदना हर समय मेरा नाम गुनगुनाता है। जो मेरा नाम जपते हैं, मैं स्वयं को भी उन्हें सौंप देता हूँ।”

अगले दिन ब्राह्मण सदना के पास गया और सारी बात बताकर शालिग्राम जी लौटा दिए।

यह सुनकर सदना की आँखों में आँसू आ गए। उसने मन ही मन मांस का व्यापार छोड़ने और जीवन भर नाम-कीर्तन करने का निश्चय कर लिया।


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