अभी इस साल रविवार 14 जनवरी के दिन मकर संक्रांति आ रही है।
एक त्यौहार के रूप में इसे सम्पूर्ण भारत वर्ष में मनाया जाता है। लेकिन हम इसके पीछे जो गूढ़ आध्यात्मिक महत्त्व है उसे समझने की कोशिश करेंगे।
आध्यात्मिक साधना क्षेत्र में जो मुख्य सिद्धिप्रद दिन माने
गए है उनमे एक मकर संक्रांति है। बाकी दिन महाशिवरात्रि ,
होली ,जन्माष्टमी और दीपावली है। इसके साथ साथ
चारो नवरात्रियाँ भी है। यह सिद्धि प्राप्त करने के पर्व है।
सूर्य कालचक्र में पुरे वर्ष में 12 राशियों से गुजरता है।
जब सूर्य एक राशि से दूसरे राशि में प्रवेश करता है तो उसे
राशि संक्रमण कहते है। संक्रमण का अर्थ है एक जगह से
दूसरे जगह प्रवेश करना। वैसे तो सारे ग्रह हर एक राशि से दूसरे राशि में करते रहते है लेकिन पृथ्वी मंडल को सिर्फ सूर्य से ही सीधे सरल स्पष्ट रूप में ब्रम्हाण्डीय ऊर्जा मिलती है जिसका परिणाम हमें दृश्य रूप में भी दिखाई देता है। इसीलिए सूर्य का राशि परिवर्तन पृथ्वी मंडल के लिए बहुत महत्त्व रखता है। सूर्य का राशि चक्र के एक राशि से दूसरे राशि में संक्रमण ऋतु परिवर्तन से जुड़ा है। और ऋतु परिवर्तन पृथ्वी मंडल पर प्रकृति के बदलाव का मुख्य कारण है। जब सूर्य एक राशि से दूसरे राशि में प्रवेश करते है तो उनकी किरणों का रेडिएशन लेवल कुछसमय के लिए ब्रम्हाण्डीय ऊर्जा में परिवर्तन लाता है। उस छोटे से समय में जिसे संक्रमण का पर्व काल कहते है अगर हम कुछ आध्यात्मिक क्रिया साधना ई. करते है तो उस ब्रम्हाण्डीय ऊर्जा का कुछ अंश हम सीधे तरीके से ग्रहण कर सकते है जिस ऊर्जा को हम अपनी भौतिक या आध्यात्मिक समस्या निवारण के लिए उपयोग में ला सकते है।
पृथ्वी के लिए सूर्य की कक्षा में अपनी विशिष्ट स्थिति के कारण सूर्य का कर्क राशि और मकर राशि का संक्रमण सबसे ज्यादा मायने रखता है। क्योंकि ये दो points ऐसे है की जैसे ही सूर्य कर्क राशि में प्रवेश करता है तो सूर्य पृथ्वी से दक्षिण दिशा की तरफ सरकने लगता है जिसे दक्षिाणायन कहते है। और मकर राशि में प्रवेश करते है तो उत्तर की तरफ सरकने लगता है उत्तरायण कहते है। पृथ्वी का axis थोड़ा झुका हुवा है जिसे अयनांश कहते है। इसके कारण हर 70 सालो में सूर्य दक्षिण की तरफ थोडासा अंश सरकता है जिससे उत्तरायण के आरम्भ के दिन में परिवर्तन आते है। कुछ सालो बाद मकर संक्रांति 14 के बजाय 15 को ही आती रहेगी।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से उत्तरायण में सूर्य की पॉजिटिव ऊर्जा ज्यादा मिलती है। गरमी बढ़ने लगती है। पुराणो में उत्तरायण को देवों का दिन कहा जाता है। इसी पॉजिटिव ऊर्जा के कारण पितामह भीष्म ने उत्तरायण में शरीर त्यागने की इच्छा व्यक्त की थी।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से दक्षिाणायन में सूर्य की ऊर्जा उतनी पॉजिटिव नहीं होती।
इसके कारण इसी काल में हमारे संस्कृति में ज्यादा से ज्यादा व्रत या धार्मिक पर्व होते है जैसे श्रावण मास ,गणेश चतुर्थी ,नवरात्रि ,दिवाली आदि जिससे हम उन धार्मिक आध्यात्मिक क्रियायों के माध्यम से आध्यात्मिक ऊर्जा की पूर्ति कर सके।
मकर संक्रमण में सूर्य का मकर राशि में प्रवेश होता है। इससे सूर्य गुरु की राशि धनु से शनि के मकर राशि में आते है। धनु राशि अग्नि तत्व की है और सूर्य भी अग्नि तत्व के है। सूर्य और गुरु की मित्रता है। लेकिन मकर राशि पृथ्वी तत्व की और शनि की राशि है। पृथ्वी तत्व की और शनि के स्वामित्व की इस राशि में सूर्य की ऊर्जा कुछ suffocate हो जाती है। सूर्य और शनि पिता पुत्र है और उनकी आपस में बनती नहीं। इसीलिए किसी व्यक्ति के 'कुंडली में' अगर सूर्य शनि की युति हो तो ऐसे व्यक्ति के पिता के साथ उसकी बनती नहीं। या पिता के सुख में कमी होती है। या फिर पिता के मृत्यु के बाद ही उस व्यक्ति का भाग्योदय होता है। चलो फिरसे अपने मूल विषय पे आते है।
शनि की मकर राशि में सूर्य का प्रवेश कई अर्थो में महत्वपूर्ण है।
कई मान्यताओं के अनुसार भारत वर्ष की राशि मकर है और यह शनि प्रधान देश है। इसीलिए मकर राशि में सूर्य का प्रवेश भारत के लिए महत्त्व रखता है। इसीलिए यह हमारे दूसरे त्यौहार के तरह तिथि पर आधारित न होते हुए तारीख के अनुसार मनाया जाता है , फिर भी लगबग हर प्रांत में अलग अलग नामो से मनाया जाता है। सम्पूर्ण देश में इस त्यौहार का महत्त्व है।
राजा भगीरथ ने साधना और अथक परिश्रम से गंगा को पृथ्वी पर लाया था और इसी मकर संक्रांति के दिन गंगा जाकर गंगा सागर में समुद्र से मिली थी इसीलिए मकर संक्रमण के अवसर पर लाखों लोग गंगा सागर में गंगा स्नान कर माँ गंगा की कृपा प्राप्त करते है।
इस दिन तिल और गुड का महत्त्व होता है। तिल और गुड के लड्डू या रेवडी बनाकर आपस में बाटी जाती है। इसके पीछे भी एक गूढ़ अर्थ है। शनि का तिल पर प्रभाव होता है और गुड पर सूर्य का। इसीलिए सूर्य के शनि के राशि प्रवेश पर तिल और गुड एक साथ मिलाकर खाते है। तिल में एक ऐसी शक्ति होती है की वह सत्व गुण absorb करके उसे वृद्धिंगत कर सकता है। सत्व गुणों का वातावरण में बढ़ना बहुत जरुरी होता है क्योंकि रज और तमो गुणों का प्रभाव तो अपने आप बढ़ता है उसके लिए हमें कुछ करने की जरुरत है ही नहीं।
तिल और गुड के लड्डू मकर संक्रांति के दिन भगवान के सामने भोग के रूप में चढ़ाये जाते है। ईश्वर के सत्व गुण तिल खिंच लेता है और जब हम प्रसाद के रूप में एक दूसरे को देते है और बधाई देते है तो हमारे सत्व गुण उस तिल खाने से बढ़ते है। इसी तिल गुड के एक दूसरे को देने से सत्व गुण की लेन देन होती है।
एक पुरातन आयुर्वेद ग्रन्थ की मान्यता अनुसार जो व्यक्ति मकर संक्रांति के दिन तिल गुड का सेवन करते है उन्हें बारिश के मौसम में संधिवात के तकलीफ नहीं होगी। संधिवात का मुख्य कारण ज्योतिष के गणित से शनि का दुर्बल होना और रोग के षष्ठम स्थान से शनि का सम्बन्ध होना। शनि का वात पर प्रभाव होता है और वात की गड़बड़ी से संधिवात होता है।
मकर संक्रांति के तुरंत बाद माघ गुप्त नवरात्रि आती है। और
कर्क संक्रांति के समय आषाढ़ गुप्त नवरात्रि आती है।
नवरात्रि का क्रम ऐसा है की उत्तरायण में सूर्य का प्रवेश अर्थात सूर्य उत्तर दिशा की तरफ सरकने लगता है तो तुरंत
बाद माघ गुप्त नवरात्रि और जब उत्तर में होता है तो चैत्र नवरात्रि होती है। और कर्क संक्रांति में प्रवेश होता है तो दक्षिणायन में प्रवेश पर आषाढ़ गुप्त नवरात्रि और फिर आश्विन मास में आश्विन नवरात्रि होती है।हर ऋतु परिवर्तन के समय नवरात्रि आती है।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से मकर संक्रांति अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है। यह सूर्य से जुड़ा हुवा पर्व है। इस दिन पर्व काल में सूर्य को अर्घ्य दे और उनका पूजन तर्पण मन्त्र जाप करे। साथ में शक्ति साधना अवश्य करे। शक्ति साधना का अर्थ है भगवती के किसी स्वरुप की साधना।
इस बार मकर संक्रांति रविवार 14 जनवरी के दिन है। उस दिन पर्व काल साधारणतः महाराष्ट्र मे दोपहर पावने दो बजे से लेकर सूर्यास्त तक है। इस दिन प्रदोष भी है ..
आप उस दिन पर्व काल समय मे साधना अवश्य करे।
सर्व प्रथम गुरु स्मरण ,गुरु मंत्र का जप। फिर गणेश स्मरण
और फिर संकल्प कर सूर्य का ध्यान मन्त्र पढ़े
जपा कुसुम संकाशं काश्यपेयं महाद्युतिम
तमोरिं सर्व पापघ्नम् प्रणतोस्मि दिवाकरम
श्री सूर्य नारायण आवाहयामि पूजयामि नमः
अब भगवान सूर्य का पंचोपचार पूजन करे
श्री सूर्य नारायण देवता प्रीत्यर्थे पंचोपचार पूजनम
समर्पयामि।
फिर सूर्य भगवान का एक एक नाम पढ़कर पुष्प
अक्षत अर्पण करे
ॐ मित्राय नमः
ॐ रवये नमः
ॐ सूर्याय नमः
ॐ भानवे नमः
ॐ खगाय नमः
ॐ पूष्णे नमः
ॐ हिरण्यगर्भाय नमः
ॐ मरीचये नमः
ॐ आदित्याय नमः
ॐ सवित्रे नमः
ॐ अर्काय नमः
ॐ भास्कराय नमः
अब सूर्य को अर्घ्य दे।
जल में कुंकुम ,अष्टगंध ,पुष्प ,कपूर सुगन्धित द्रव्य मिला कर किसी पात्र में सूर्य गायत्री मन्त्र बोलकर छोड़े
ॐ भास्कराय विद्महे दिवाकराय धीमहि तन्नो सूर्य: प्रचोदयात
ॐ भास्कराय विद्महे महाद्युतिकराय धीमहि तन्नो सूर्य: प्रचोदयात
ॐ आदित्याय विद्महे मार्तण्डाय धीमहि तन्नो सूर्य: प्रचोदयात
और फिर सूर्य भगवान का निम्न मन्त्र का यथाशक्ति जाप करे
ॐ ह्रीम सूर्याय नमः
और आप सूर्य सम्बंधित कोई भी स्तोत्र का पाठ सकते है।
उसके बाद भगवती के किसी भी स्वरुप की चाहे दुर्गा
या महालक्ष्मी या महाकाली या अन्य महाविद्या के स्वरुप
की यथाशक्ति साधना करे। साधना में ,पूजन ,आवरण पूजन ,अष्टोत्तर या सहस्त्र नामावली पूजन ,स्तोत्र पाठ ,मन्त्र जाप या हवन कर सकते है।
ज्योतिष के ग्रह योग भगवती दुर्गा , काली या महालक्ष्मी की साधना सूचित कर रहे है। बाकी आप अपनी इष्ट की साधना भी कर सकते है।
आध्यात्मिक साधकों को इस पर्व में
आध्यात्मिक अनुभूतियाँ निश्चित है।
कुछ भी साधना करे तो फल अवश्य मिलेगा क्योंकि
मकर संक्रांति का पर्व काल सिद्धिप्रद होता ही है।
आपको इस पर्व की शुभकामनाये और आपकी
साधना सफल हो यही श्री गुरु के चरणों में नम्र प्रार्थना है।
जय श्री राम ......
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