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मंगलवार, 6 फ़रवरी 2018

मृत्यु से भय कैसा



श्रीमद्भागवत से जीवन का महान सत्य

मार्गदर्शन: Dr. Bhargu Astrologer
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जब राजा परीक्षित को शुकदेव जी महाराज श्रीमद्भागवत पुराण का उपदेश दे रहे थे, तब छह दिन बीत चुके थे। तक्षक नाग के श्राप के अनुसार राजा की मृत्यु में अब केवल एक दिन शेष रह गया था। फिर भी राजा परीक्षित के मन से मृत्यु का भय और शोक पूरी तरह दूर नहीं हुआ था। मृत्यु का समय निकट देखकर राजा का मन अत्यंत व्याकुल और अशांत हो उठा।

तब शुकदेव जी महाराज ने राजा परीक्षित को एक कथा सुनानी आरंभ की।

बहुत प्राचीन समय की बात है। एक राजा शिकार खेलने जंगल गया। संयोगवश वह रास्ता भटक गया और घने, भयावह जंगल में जा पहुँचा। रात हो गई, मूसलाधार वर्षा होने लगी। सिंह, व्याघ्र और अन्य हिंसक पशुओं की गर्जना से जंगल गूँज उठा। राजा अत्यंत भयभीत हो गया और रात्रि बिताने के लिए किसी आश्रय की खोज करने लगा।

अंधकार में उसे दूर एक दीपक की लौ दिखाई दी। वहाँ पहुँचकर उसने एक बहेलिये की झोंपड़ी देखी। वह झोंपड़ी छोटी, अंधेरी, अत्यंत गंदी और दुर्गंध से भरी हुई थी। बहेलिया चल-फिर नहीं सकता था, इसलिए उसने झोंपड़ी के एक कोने में ही मल-मूत्र त्याग का स्थान बना रखा था। अपने भोजन के लिए वह जानवरों का मांस झोंपड़ी की छत पर लटकाए रहता था।

राजा पहले तो झिझका, पर कोई अन्य आश्रय न देखकर उसने बहेलिये से एक रात ठहरने की विनती की। बहेलिये ने कहा कि यहाँ जो भी आता है, सुबह जाने में झंझट करता है। इस झोंपड़ी की गंध उन्हें ऐसी भा जाती है कि वे इसे छोड़ना नहीं चाहते। राजा ने प्रतिज्ञा की कि वह प्रातः होते ही झोंपड़ी खाली कर देगा। तब बहेलिये ने शर्त के साथ उसे ठहरने की अनुमति दे दी।

राजा पूरी रात उसी झोंपड़ी में पड़ा रहा। सुबह जब उसकी नींद खुली, तो वही दुर्गंध उसे प्रिय लगने लगी। उसने अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य को भुला दिया और वहीं स्थायी रूप से रहने का विचार करने लगा। उसने बहेलिये से और ठहरने की प्रार्थना की। इस पर बहेलिया क्रोधित हो गया और दोनों के बीच झोंपड़ी को लेकर विवाद हो गया।

कथा समाप्त कर शुकदेव जी महाराज ने पूछा, “हे परीक्षित! क्या उस राजा का उस गंदी झोंपड़ी में सदा रहने का आग्रह करना उचित था?”
राजा परीक्षित ने उत्तर दिया, “भगवन्! वह राजा अत्यंत मूर्ख था, जो अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर और अपना वास्तविक उद्देश्य भूलकर ऐसी गंदी झोंपड़ी में रहना चाहता था।”

तब शुकदेव जी महाराज बोले, “हे राजन परीक्षित! वह मूर्ख राजा तुम स्वयं हो। यह देह भी मल-मूत्र की गठरी है। जितने समय के लिए आत्मा को इसमें रहना था, वह अवधि कल समाप्त हो रही है। अब तुम्हें उस लोक जाना है जहाँ से तुम आए हो, फिर भी तुम इस देह को छोड़ना नहीं चाहते। क्या यह मूर्खता नहीं है?”

यह सुनते ही राजा परीक्षित का अज्ञान नष्ट हो गया। उन्होंने मृत्यु को सहर्ष स्वीकार कर लिया और बंधन-मुक्ति के लिए तैयार हो गए।

वास्तव में यही सत्य है। जब जीव माँ की कोख में होता है, तो वह भगवान से प्रार्थना करता है—“हे प्रभु! मुझे यहाँ से मुक्त कीजिए, मैं आपका भजन-स्मरण करूँगा।” लेकिन जन्म लेकर इस संसार में आने के बाद वह इसी देह और संसार से ऐसा मोह कर लेता है कि अपना वास्तविक उद्देश्य भूल जाता है।

यही मेरी कथा है… और यही आपकी भी।


मार्गदर्शन: Dr. Bhargu Astrologer
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