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शनिवार, 20 जनवरी 2018

नारी : पूजा से सम्मान तक



नारी : पूजा से सम्मान तक

“जहाँ नारियों की पूजा होती है, वहाँ देवता निवास करते हैं।”
यह पंक्ति कहने में जितनी सरल है, इसका अर्थ उतना ही गहरा है।
आज यदि हम इस कथन पर गंभीरता से विचार करें, तो महसूस होगा कि यह वाक्य
अधिकतर पुस्तकों तक ही सीमित रह गया है।
कहने-सुनने में तो यह अत्यंत सुंदर लगता है,
परंतु क्या आज इसका वास्तविक पालन कहीं दिखाई देता है?

आज का युग जिसे हम आधुनिक युग कहते हैं,
वह आज भी नारी को कमज़ोर और अबला मानता है।
हम भले ही आधुनिक हो गए हों,
पर क्या हमारी मानसिकता भी आधुनिक हुई है?
क्या हमारे विचार बदले हैं?
उत्तर है — नहीं।

प्राचीन काल में नारी को देवी के समान माना जाता था,
पर तब भी उसे अबला समझा गया।
रामराज्य में सीता को अबला समझकर उसका हरण हुआ।

आज और उस युग में बस इतना ही अंतर है कि—
उस समय सीता की रक्षा के लिए श्रीराम तत्पर थे और उन्होंने रक्षा की।

कहा गया है—
“तू अबला है, क्या फर्क पड़ता है!
राजा राम हो या रावण—
रावण हो तो हरण होगा,
राम हो तो अग्नि परीक्षा ली जाएगी।”


आज की सामाजिक सच्चाई

आज का समाज कन्या को बोझ मानता है।
हमारे देश में प्रति हजार पुरुषों पर स्त्रियों की संख्या कम होना
एक गंभीर चिंता का विषय है।

निर्धन परिवार में कन्या के जन्म के साथ ही
दहेज की चिंता जन्म ले लेती है।
इसे रोकने के लिए हमें दहेज जैसी कुप्रथा को जड़ से समाप्त करना होगा।
हमें नारी के महत्व को समझना होगा,
क्योंकि नारी ही शक्ति का अवतार है, नारी ही संसार की जननी है।

एक कवि ने कहा है—
“यह नारी है, कुदरत का अनमोल सोना,
मगर दुनिया ने इसकी कीमत न जानी।”

नारी भगवान द्वारा प्रदत्त अनमोल उपहार है।
समाज को नारी के प्रति अपना नज़रिया बदलना होगा
और उसे समाज का अहम हिस्सा मानकर आगे बढ़ना होगा,
ताकि हमारा देश केवल विकासशील नहीं,
बल्कि विकसित राष्ट्र बने और आकाश की ऊँचाइयों को छुए।


नारी : शिक्षा, शक्ति और पहचान

नारी के सुझावों को महत्व देना होगा,
क्योंकि उसका भी समाज में अपना स्थान, अपना महत्व और अपनी पहचान है।

आज भी निर्धन लोग यह कहकर कन्याओं को शिक्षा से वंचित रखते हैं कि—
“वह पढ़कर क्या करेगी, वह तो पराया धन है।”
वे यह नहीं समझते कि शिक्षा जीवन का अनिवार्य अंग है।

नारी अत्यंत कोमल होती है,
पर समय पड़ने पर उतनी ही कठोर और साहसी भी।
वह ओस की उस बूंद के समान है,
जो कोमल भी है और तेजस्वी भी।

प्राचीन काल में गार्गी और मैत्रेयी जैसी महान विदुषियाँ थीं।
क्या समाज उन्हें भूल गया?
क्या समाज यह भी भूल गया कि नारी—
धैर्य, क्षमा और प्रेम की मूर्ति होने के साथ-साथ
घर, परिवार और देश की शान है?

नारी दीपक के समान है—
जो स्वयं जलकर दूसरों को प्रकाश देती है।
वह अपनी परवाह किए बिना दूसरों के लिए कष्ट सहती है
और उन्हें जीने का मार्ग दिखाती है।

पर हमारा समाज इतना कृतघ्न है कि
इसे नारी का उपकार नहीं, बल्कि उसका कर्तव्य मान लेता है
और उसके योगदान की उपेक्षा करता है।


निष्कर्ष

नारी को समाज से वही सम्मान मिलना चाहिए
जिसकी वह अधिकारी है।
समाज को यह समझना होगा कि नारी कमज़ोर नहीं है—
वह समय पड़ने पर अपनी रक्षा स्वयं कर सकती है।

भक्ति में मीराबाई,
वीरता में रानी लक्ष्मीबाई,
त्याग में पन्ना धाय,
नेतृत्व में इंदिरा गांधी,
विज्ञान में कल्पना चावला,
और सर्वोच्च पद पर श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटिल
नारी शक्ति के जीवंत उदाहरण हैं।

आज भी यह हमारे लिए गर्व की बात है कि
हमारे राज्य में वसुंधरा राजे सिंधिया जैसी मुख्यमंत्री रही हैं।


जय हिन्द 🇮🇳

समस्त मातृशक्ति को नमन 🙏


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