पितामह भीष्म के जीवन का एक ही पाप था —
उन्होंने समय पर क्रोध नहीं किया।
और जटायु के जीवन का एक ही पुण्य था —
उसने समय पर क्रोध किया।
परिणामस्वरूप
एक को बाणों की शैय्या मिली
और दूसरे को प्रभु श्रीराम की गोद।
वेद कहता है —
“क्रोध भी तब पुण्य बन जाता है, जब वह धर्म और मर्यादा की रक्षा के लिए किया जाए,
और सहनशीलता भी तब पाप बन जाती है, जब वह धर्म और मर्यादा को बचा नहीं पाती।”
🙏 जय श्री कृष्ण 🙏
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